लखनऊ | पश्चिम बंगाल चुनाव के नतीजों के बाद समाजवादी पार्टी (सपा) प्रमुख Akhilesh Yadav ने एक बड़ा राजनीतिक फैसला लेते हुए चुनावी रणनीति तैयार करने वाली कंपनी Indian Political Action Committee (I-PAC) के साथ अपना करार खत्म कर दिया है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनावों की तैयारी तेज हो रही है और विपक्षी दल अपनी-अपनी रणनीतियों को धार देने में जुटे हैं।

फंड की कमी बनी बड़ी वजह
लखनऊ में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान अखिलेश यादव ने साफ तौर पर कहा कि I-PAC के साथ उनका सहयोग अब जारी नहीं रह सकता क्योंकि पार्टी के पास पर्याप्त फंड नहीं है। उन्होंने कहा कि कुछ महीनों तक कंपनी ने उनके साथ काम किया, लेकिन अब वित्तीय सीमाओं के चलते यह साझेदारी आगे नहीं बढ़ सकती।
अखिलेश ने यह भी इशारा किया कि मौजूदा समय में चुनावी रणनीति बनाने वाली कंपनियों का खर्च काफी ज्यादा होता है। उन्होंने कहा कि आजकल राजनीतिक दलों को चुनाव जीतने के लिए डेटा एनालिसिस, सर्वे, सोशल मीडिया मैनेजमेंट और नकारात्मक प्रचार तक के लिए अलग-अलग कंपनियों को हायर करने की सलाह दी जाती है, जो बेहद महंगा साबित होता है।
I-PAC क्या है और क्यों है खास?
Indian Political Action Committee भारत की पहली प्रोफेशनल चुनावी कंसल्टेंसी कंपनी मानी जाती है, जिसकी स्थापना प्रसिद्ध चुनावी रणनीतिकार Prashant Kishor ने की थी। I-PAC ने देश की कई बड़ी पार्टियों के लिए सफल चुनावी अभियान चलाए हैं।
इस कंपनी की सबसे बड़ी पहचान इसकी डेटा-आधारित रणनीति, बूथ लेवल मैनेजमेंट और डिजिटल कैंपेनिंग है। I-PAC ने कई राज्यों में चुनावी जीत में अहम भूमिका निभाई है, जिससे इसकी विश्वसनीयता काफी बढ़ी है।
ममता और स्टालिन की जीत में अहम भूमिका
हाल के वर्षों में I-PAC ने Mamata Banerjee की पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) और M. K. Stalin की डीएमके (DMK) के लिए चुनावी रणनीति तैयार की थी।
- पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की जीत में I-PAC की रणनीति को निर्णायक माना गया
- तमिलनाडु में DMK की सत्ता वापसी में भी इस कंपनी की बड़ी भूमिका रही
इसी सफलता को देखते हुए अखिलेश यादव ने भी 2027 के यूपी चुनावों के लिए I-PAC को हायर किया था।
कैसे हुई थी सपा और I-PAC की डील?
सूत्रों के मुताबिक, सपा और I-PAC के बीच बातचीत की शुरुआत दिसंबर 2025 में दिल्ली में हुई थी। इसके बाद जनवरी 2026 में पश्चिम बंगाल दौरे के दौरान अखिलेश यादव और I-PAC टीम के बीच दूसरी बैठक हुई।
इन बैठकों के बाद समाजवादी पार्टी ने आधिकारिक तौर पर I-PAC को अपनी चुनावी रणनीति तैयार करने की जिम्मेदारी सौंपी थी। इस रणनीति में शामिल थे:
- बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं का प्रशिक्षण
- वोटर टर्नआउट बढ़ाने के लिए ऐप आधारित तकनीक
- विपक्षी दलों की कमजोरियों का विश्लेषण
- सोशल मीडिया और डिजिटल कैंपेन
अब कौन संभालेगा सपा की रणनीति?
I-PAC से करार खत्म होने के बाद समाजवादी पार्टी ने अपनी चुनावी तैयारियों को पूरी तरह नहीं छोड़ा है। पार्टी ने अलग-अलग कंपनियों को अलग-अलग जिम्मेदारियां दी हैं।
- डेटा एनालिसिस का काम मुंबई की ‘शो टाइम कंसल्टिंग’ को दिया गया है
- सर्वे और ग्राउंड रिपोर्ट का काम कर्नाटक की एक एजेंसी संभाल रही है
इससे साफ है कि सपा अब एक मल्टी-वेंडर मॉडल पर काम कर रही है, जहां अलग-अलग कंपनियां अलग-अलग हिस्सों की जिम्मेदारी संभालेंगी।
यूपी में पहले भी मिल चुका है झटका
यह पहली बार नहीं है जब प्रशांत किशोर और उत्तर प्रदेश की राजनीति का सामना हुआ है। 2017 के विधानसभा चुनाव में PK ने कांग्रेस के लिए रणनीति बनाई थी और “27 साल यूपी बेहाल” का नारा दिया था।
बाद में कांग्रेस और सपा के बीच गठबंधन हो गया, लेकिन चुनावी नतीजे बेहद निराशाजनक रहे:
- कांग्रेस को केवल 7 सीटें मिलीं
- सपा 47 सीटों पर सिमट गई
इस अनुभव के बाद भी अखिलेश यादव ने I-PAC पर भरोसा जताया था, लेकिन अब यह साझेदारी टूट चुकी है।
क्या होगा यूपी 2027 पर असर?
I-PAC से करार टूटने का सीधा असर 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों की रणनीति पर पड़ सकता है। जहां एक तरफ Yogi Adityanath के नेतृत्व में भाजपा अपनी तैयारियों में जुटी है, वहीं विपक्ष को मजबूत रणनीति की जरूरत है।
विशेषज्ञों का मानना है कि:
- सपा को अब अपनी रणनीति खुद मजबूत करनी होगी
- फंडिंग और संसाधनों की कमी बड़ा चुनौती बन सकती है
- मल्टी-कंपनी मॉडल कितना सफल होगा, यह देखना होगा

