भारत को वर्ष 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाने की दिशा में नीति आयोग ने पहली बार इन्वेस्टमेंट फ्रेंडलीनेस इंडेक्स (Investment Friendliness Index, IFI) 2026 जारी किया है। यह सूचकांक राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की निवेश आकर्षित करने की क्षमता का व्यापक आकलन करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल राज्यों की रैंकिंग भर नहीं है, बल्कि निवेश, रोजगार और औद्योगिक विकास की नई प्रतिस्पर्धा की शुरुआत भी है।
भारत वैश्विक निवेश के प्रमुख केंद्रों में अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश कर रहा है। ऐसे समय में यह सूचकांक इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि निवेशक केवल कर छूट या प्रोत्साहन योजनाओं के आधार पर निर्णय नहीं लेते, बल्कि आधारभूत संरचना, नीतिगत स्थिरता, प्रशासनिक दक्षता और व्यापार करने में आसानी जैसे कई पहलुओं को भी महत्व देते हैं। IFI इन्हीं कारकों का समग्र मूल्यांकन प्रस्तुत करता है।
नीति आयोग के अनुसार, सूचकांक राज्यों का आकलन आठ प्रमुख मानकों पर करता है, जिनमें आधारभूत संरचना, व्यापारिक वातावरण, संसाधनों की उपलब्धता, सरकारी नीतियां, नियामकीय व्यवस्था, संस्थागत क्षमता, वित्तीय स्थिति और पर्यावरणीय स्थिरता शामिल हैं। इन मानकों का उद्देश्य यह समझना है कि कौन से राज्य निवेशकों के लिए सबसे अनुकूल वातावरण उपलब्ध करा रहे हैं।
पहले संस्करण में गुजरात ने शीर्ष स्थान हासिल किया है, जबकि महाराष्ट्र और तमिलनाडु दूसरे और तीसरे स्थान पर रहे हैं। इन राज्यों की सफलता के पीछे मजबूत औद्योगिक आधार, बेहतर कनेक्टिविटी, कुशल कार्यबल, उद्योग समर्थक नीतियां और अपेक्षाकृत प्रभावी प्रशासन को प्रमुख कारण माना जा रहा है। वहीं, अन्य राज्यों के लिए यह सूचकांक सुधार की दिशा तय करने का अवसर प्रदान करता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि इस पहल से राज्यों के बीच प्रतिस्पर्धी संघवाद को नई गति मिल सकती है। बेहतर रैंक हासिल करने के लिए राज्य निवेश प्रक्रियाओं को सरल बनाने, मंजूरी की समयसीमा घटाने, डिजिटल प्रशासन को बढ़ावा देने और उद्योगों के लिए अनुकूल नीतियां लागू करने पर अधिक ध्यान देंगे। इससे घरेलू निवेश के साथ-साथ प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) आकर्षित करने में भी मदद मिल सकती है।
इस सूचकांक का महत्व केवल निवेश तक सीमित नहीं है। यदि राज्यों में निवेश बढ़ता है तो विनिर्माण, सेवा क्षेत्र, स्टार्टअप और एमएसएमई को विस्तार मिलेगा। इसके परिणामस्वरूप रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे, स्थानीय अर्थव्यवस्था मजबूत होगी और क्षेत्रीय विकास को गति मिलेगी। यह पहल “मेक इन इंडिया”, “आत्मनिर्भर भारत” और विकसित भारत 2047 जैसे राष्ट्रीय लक्ष्यों को भी मजबूती प्रदान कर सकती है।
हालांकि, कई अर्थशास्त्रियों का मानना है कि केवल रैंकिंग से निवेश सुनिश्चित नहीं हो जाता। राजनीतिक स्थिरता, कानून व्यवस्था, भूमि की उपलब्धता, बिजली आपूर्ति, लॉजिस्टिक्स, न्यायिक प्रक्रिया और नीतियों की निरंतरता जैसे कारक भी निवेशकों के निर्णय में समान रूप से महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए राज्यों को केवल अपनी रैंक सुधारने के बजाय वास्तविक सुधारों पर भी ध्यान देना होगा।
पर्यावरणीय संतुलन भी इस पूरी प्रक्रिया का महत्वपूर्ण पहलू है। औद्योगिक विकास की दौड़ में यदि पर्यावरणीय मानकों की अनदेखी होती है, तो दीर्घकालिक आर्थिक विकास प्रभावित हो सकता है। यही कारण है कि सूचकांक में पर्यावरणीय स्थिरता को भी प्रमुख मानकों में शामिल किया गया है।
नीति आयोग का इन्वेस्टमेंट फ्रेंडलीनेस इंडेक्स 2026 भारत में निवेश आधारित विकास मॉडल को नई दिशा देने की क्षमता रखता है। आने वाले वर्षों में इसकी वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि राज्य इन निष्कर्षों को नीतिगत सुधारों में कितनी प्रभावी ढंग से बदलते हैं। यदि ऐसा होता है, तो यह सूचकांक केवल एक वार्षिक रैंकिंग नहीं, बल्कि भारत को वैश्विक निवेश केंद्र बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण नीति उपकरण साबित हो सकता है।
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Tuesday, September 15
