भारत की अर्थव्यवस्था को अगले दशक में नई गति देने के उद्देश्य से नीति आयोग ने “रोडमैप फॉर बिल्डिंग इंडिया ऐज ए लीडिंग बायोइकोनॉमी पावरहाउस” जारी किया है। वर्ष 2035 तक भारत को वैश्विक जैव अर्थव्यवस्था के अग्रणी देशों में शामिल करने की इस रणनीति का उद्देश्य केवल आर्थिक विकास तक सीमित नहीं है, बल्कि नवाचार, रोजगार, स्वास्थ्य, कृषि और हरित उद्योगों को भी नई दिशा देना है।
वर्तमान में भारत की बायोइकोनॉमी तेजी से विस्तार कर रही है। जैव प्रौद्योगिकी, फार्मास्यूटिकल्स, वैक्सीन निर्माण, जैव ईंधन, कृषि नवाचार और जैव आधारित विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में देश ने पिछले कुछ वर्षों में उल्लेखनीय प्रगति दर्ज की है। कोविड-19 महामारी के दौरान भारत ने वैक्सीन उत्पादन और आपूर्ति के माध्यम से अपनी जैव प्रौद्योगिकी क्षमता का प्रदर्शन भी किया। इसी पृष्ठभूमि में नीति आयोग का यह रोडमैप भारत को वैश्विक बायोइकोनॉमी हब के रूप में स्थापित करने की दिशा में एक दीर्घकालिक रणनीति प्रस्तुत करता है।
रोडमैप के अनुसार, भारत की बायोइकोनॉमी को वर्ष 2035 तक लगभग 691 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है। इसके साथ ही लगभग तीन करोड़ उच्च गुणवत्ता वाले रोजगार सृजित करने की परिकल्पना की गई है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अनुसंधान एवं विकास, नवाचार, स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र, निजी निवेश और उद्योग-अकादमिक सहयोग को मजबूत करने पर विशेष बल दिया गया है।
दस्तावेज में जैव अर्थव्यवस्था के विकास के लिए कई प्राथमिक क्षेत्रों की पहचान की गई है। इनमें स्वास्थ्य सेवाएं, जैव प्रौद्योगिकी आधारित दवाइयां, कृषि जैव प्रौद्योगिकी, खाद्य प्रसंस्करण, जैव ईंधन, हरित रसायन, जैव आधारित विनिर्माण और अपशिष्ट से मूल्य सृजन जैसी गतिविधियां शामिल हैं। इन क्षेत्रों में निवेश बढ़ने से न केवल औद्योगिक विकास को गति मिलेगी, बल्कि आयात पर निर्भरता कम करने और निर्यात बढ़ाने में भी मदद मिल सकती है।
रोडमैप में अनुसंधान और नवाचार को विशेष महत्व दिया गया है। इसके लिए जैव प्रौद्योगिकी अनुसंधान संस्थानों, विश्वविद्यालयों और निजी उद्योगों के बीच सहयोग बढ़ाने, अत्याधुनिक प्रयोगशालाओं के विकास तथा नई तकनीकों के व्यावसायीकरण को प्रोत्साहित करने की सिफारिश की गई है। साथ ही जैव प्रौद्योगिकी स्टार्टअप को वित्तीय सहायता और निवेश उपलब्ध कराने के लिए बायोइकोनॉमी ग्रोथ फंड स्थापित करने का भी प्रस्ताव रखा गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस रोडमैप को प्रभावी ढंग से लागू किया जाता है, तो भारत वैश्विक जैव प्रौद्योगिकी उद्योग में अपनी हिस्सेदारी उल्लेखनीय रूप से बढ़ा सकता है। इससे देश में उच्च कौशल आधारित रोजगार के अवसर बढ़ेंगे, नवाचार को प्रोत्साहन मिलेगा और स्वास्थ्य, कृषि तथा पर्यावरण से जुड़ी चुनौतियों के समाधान में भी सहायता मिलेगी।
हालांकि, इस महत्वाकांक्षी लक्ष्य के सामने कई चुनौतियां भी हैं। अनुसंधान पर पर्याप्त निवेश, कुशल मानव संसाधन की उपलब्धता, नियामकीय प्रक्रियाओं का सरलीकरण, बौद्धिक संपदा अधिकारों की सुरक्षा और निजी क्षेत्र की सक्रिय भागीदारी ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर निरंतर काम करने की आवश्यकता होगी। इसके अलावा, जैव प्रौद्योगिकी के विकास के साथ जैव सुरक्षा, नैतिक मानकों और पर्यावरणीय संतुलन को बनाए रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण होगा।
भारत पहले ही वैक्सीन निर्माण, जेनेरिक दवाओं और जैव प्रौद्योगिकी अनुसंधान में वैश्विक पहचान बना चुका है। अब नीति आयोग का यह रोडमैप उस क्षमता को व्यापक आर्थिक परिवर्तन में बदलने का प्रयास है। यदि केंद्र और राज्य सरकारें, उद्योग, अनुसंधान संस्थान और निजी क्षेत्र समन्वित रूप से कार्य करते हैं, तो यह पहल भारत को वैश्विक जैव अर्थव्यवस्था के अग्रणी देशों की श्रेणी में पहुंचाने के साथ विकसित भारत 2047 के लक्ष्य को भी नई मजबूती प्रदान कर सकती है।
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Wednesday, September 16
