मार्च और अप्रैल के शुरुआती दिनों तक मौसम की गजब आंख-मिचौली चलती रही। अब गर्मी का कहर बढ़ रहा है। दिन के समय झुलसाने वाली धूप से गर्मी का असर अब सूरज ढलने के बाद भी बना रह रहा है। आलम यह है कि आधी रात के समय तक दीवारें गर्म रह रही हैं। पंखे और कूलर का असर खत्म हो रहा है। रात के समय मिलने वाली राहत अब गायब होती जा रही है, क्योंकि न्यूनतम तापमान सामान्य से 6.4 डिग्री सेल्सियस ऊपर पहुंचने लगा है। वैज्ञानिक इसे ‘वार्म नाइट्स’ कहते हैं। लोग देर शाम भी घर से लेकर सार्वजनिक जगहों पर नल से नहाते देखे जा रहे हैं। देश का 55 प्रतिशत हिस्सा हाई हीट रिस्क जोन में आ चुका है। इसकी वजह क्या है, आइए समझते हैं।
देश में बढ़ते गर्मी संकट के बीच इन ‘गर्म रातों’ को अब भी नजरअंदाज किया जा रहा है। सुबह से दोपहर और शाम तक की चर्चा तो हो ही रही है। वैश्विक जलवायु परिवर्तन और स्थानीय शहरीकरण के दोहरे प्रभाव के कारण भारत में रातें लगातार गर्म हो रही हैं। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने महाराष्ट्र और तेलंगाना के कुछ हिस्सों को छोड़कर देश के अधिकांश हिस्सों में असामान्य रूप से गर्म रातों और सामान्य से अधिक न्यूनतम तापमान का पूर्वानुमान जताया है।
क्या होती है वार्म नाइट यानी ‘गर्म रात’?
मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, पिछले कुछ सालों में रात के बढ़ते तापमान की समस्या गंभीर हुई है, लेकिन दिन की गर्मी की तुलना में इस पर बहुत कम ध्यान दिया जाता है। IMD के अनुसार, जब न्यूनतम तापमान सामान्य से 4.5 से 6.4 डिग्री सेल्सियस अधिक रहता है, तो उसे ‘गर्म रात’ कहा जाता है। यदि यह अंतर 6.4 डिग्री सेल्सियस से अधिक हो जाए, तो इसे ‘बेहद गर्म रात’ माना जाता है। अक्सर यह स्थिति तब बनती है, जब दिन का तापमान 40 डिग्री सेल्सियस को पार कर जाता है।
बढ़ती गर्मी को लेकर प्रमुख आंकड़े और रिसर्च हुए हैं। साइंस डायरेक्ट 2025 की रिपोर्ट बताती है कि 1980 से 2020 के बीच गर्म रातों की संख्या में प्रति दशक 2 से 8 दिनों की वृद्धि हुई है। वहीं काउंसिल ऑफ एनर्जी, एनवायरमेंट एंड वाटर (CEEW) की रिपोर्ट के अनुसार, शहरी क्षेत्रों में यह प्रभाव अधिक है। 2012–2022 के बीच मुंबई में 15, बेंगलुरु में 11 और दिल्ली में 6 अतिरिक्त गर्म रातें दर्ज की गईं। यहां एल नीनो प्रभाव भी अहम है। 2026 एक एल नीनो वर्ष होने के कारण 2027 की गर्मी और भी चुनौतीपूर्ण हो सकती है।
इन गर्म रातों यानी वार्म नाइट्स की बात करें, तो पिछले एक दशक में भारत के शहरों में इनमें 32 प्रतिशत का इजाफा हो चुका है। पिछले साल 2025 में ही फरवरी खत्म होते-होते रात का तापमान बढ़ गया था। अधिकतर जगहों पर 3 से 5 डिग्री तक बढ़ोतरी दर्ज की गई। गर्मी के फैक्टर पर बात करें, तो भारत के 266 जिले बहुत गंभीर गर्मी की कैटेगरी में हैं। वहीं 151 जिले गंभीर और 201 जिले मध्यम कैटेगरी में आ गए हैं।
रातें गर्म होने के कारण क्या हैं?
रातों के गर्म होने के पीछे दुनिया में हो रहा जलवायु परिवर्तन और गर्म होते जा रहे शहरी इलाके ही मुख्य कारण हैं। मुंबई, दिल्ली, गुरुग्राम, लखनऊ, कानपुर, बेंगलुरु, कटक, जयपुर, भोपाल जैसे शहर तेजी से इसकी चपेट में आ रहे हैं। ऊंची इमारतें और सीमेंट, कंक्रीट के घर अर्बन हीट आइलैंड का रूप लेते जा रहे हैं।
कंक्रीट का जाल: शहरों में बने घर कंक्रीट, डामर और कांच दिन भर गर्मी सोखते हैं और रात में इसे धीरे-धीरे छोड़ते हैं। मकानों की छतें भी सीमेंट की बनी होती हैं। शहरी रात की गर्मी का 60 प्रतिशत हिस्सा स्थानीय बुनियादी ढांचे के कारण है।
बढ़ती ह्यूमिडिटी: दूसरी अहम वजह नम हवा है। शुष्क हवा की तुलना में नमी वाली हवा गर्मी को अधिक समय तक रोककर रखती है। दिल्ली, चंडीगढ़ और लखनऊ जैसे शहरों में आर्द्रता में 6% से 9% की बढ़ोतरी देखी गई है।
कंपाउंड हीटवेव: अब झुलसाने वाले दिनों के बाद उतनी ही गर्म रातें आती हैं, जिससे शरीर को संभलने का मौका नहीं मिल पाता। श्रीनगर और वाराणसी जैसे शहरों में ऐसी स्थितियां सबसे अधिक देखी गई हैं।
स्वास्थ्य पर प्रभाव की गंभीरता क्या है?
रात का ठंडा तापमान शरीर के तापमान को नियंत्रित करने और गहरी नींद के लिए आवश्यक है। डॉक्टरों का कहना है कि रात में गर्मी के कारण डिहाइड्रेशन, नींद में खलल और हृदय संबंधी तनाव का खतरा बढ़ जाता है। यह हीट स्ट्रेस बुजुर्गों और बच्चों के लिए विशेष रूप से घातक है।
हृदय पर प्रभाव की बात करें, तो ब्लड प्रेशर बढ़ने से साइलेंट हार्ट अटैक और हार्ट फेलियर का खतरा कई गुना तक बढ़ जाता है। नींद की कमी भी हो रही है। रात का तापमान बिगड़ने पर डीप स्लीप और REM स्लीप, जो नींद के लिए जरूरी हिस्से हैं, प्रभावित होते हैं। दिन के बाद रात के समय भी गर्मी का होना शरीर की फिजियोलॉजी को सीधे तौर पर बाधित करता है। चिड़चिड़ापन आना, डिप्रेशन और याददाश्त कमजोर होना भी इसके असर में शामिल हैं।
समाधान के लिए क्या किया जा सकता है?
कूल रूफ, यानी ऐसी छतें जो गर्मी को परावर्तित करें।
शहरी नियोजन के जरिए बेहतर वेंटिलेशन कॉरिडोर और अधिक वृक्षारोपण।
रिफ्लेक्टिव पेवमेंट, यानी सड़कों के लिए ऐसे मटेरियल का उपयोग जो कम गर्मी सोखें।
हीट एक्शन प्लान में कमियां
भारत का हीट एक्शन प्लान वर्तमान में मुख्य रूप से दिन की गर्मी पर केंद्रित है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि तेजी से बढ़ते शहरीकरण और घटते हरित क्षेत्र के कारण मौजूदा रणनीतियां कम पड़ रही हैं। जब तक भारत अपने हीट प्लान में रात के बढ़ते तापमान को गंभीरता से शामिल नहीं करता, तब तक गर्मी से होने वाली बीमारियों और मौतों का खतरा बना रहेगा।
दुनिया की स्थिति पर गौर करें, तो पिछले करीब डेढ़ दशक से दुनिया का औसत तापमान एक डिग्री सेल्सियस से अधिक दर्ज किया गया है। 2026 में दुनिया सामान्य से 1.44 डिग्री अधिक तापमान पर है। अगले साल यानी 2027 में गर्मी प्रचंड रूप में पिछले सारे रिकॉर्ड तोड़ सकती है। तेजी से बढ़ता शहरीकरण, गाड़ियां, एसी और फैक्ट्रियों का असर अनुमान से परे जा रहा है।

